लॉकडाउन से पहले ही पुणे छोड़ने लगे मजदूर

पिंपरी। पिछले लॉकडाउन में, दूसरे राज्यों और ग्रामीण क्षेत्र के श्रमिक वर्ग ज्यादा प्रभावित हुए थे। तब मजदूरों को काफी मुश्किलों और भुखमरी का सामना करना पड़ा। इस साल भी कोरोना ने बड़ा उग्र रूप धारण किया है। ब्रेक द चेन के बाद किसी भी वक्त लॉकडाउन का ऐलान हो सकता है। हालांकि पिछले अनुभव के मद्देनजर लॉकडाउन से पहले ही श्रमिक वर्ग अपने गाँव घर का रास्ता पकड़ रहे हैं। पुणे रेलवे स्टेशन पर रोजाना उमड़ रही भीड़ इसका प्रमाण दे रही है। लॉकडाउन में यहां भूखे रहने के बजाय मजदूर वर्ग अपने परिवार के साथ गाँव जाना पसंद कर रहा है।
महामारी कोरोना के बढ़ते फैलाव के मद्देनजर राज्य में ब्रेक दि चेन मिशन ब्रेक द चेन मिशन शुरू किया गया है। इस बार लॉकडाउन में कई प्रतिष्ठान जैसे होटल, कपड़ा व्यवसाय और पैकेजिंग बंद हो गए हैं। जगह जगह लोगों भीड़ से कोरोना के मरीजों की संख्या निरंतर बढ़ रही है जिससे समूचा पुणे जिला हिल गया है। अतीत में, केवल वरिष्ठ नागरिकों को कोरोना का खतरा था;  लेकिन अब बच्चों से लेकर बुजुर्ग तक हर कोई कोरोना की चपेट में आ रहा है। तालाबंदी के बावजूद कोई मदद के लिए आगे नहीं आया। कमरे का किराया कैसे दें, क्या खाएं, अगर प्रतिबंधों को कड़ा कर दिया जाता है, तो शहर में रहना मुश्किल होगा। इसके चलते श्रमिक वर्ग का फिर से स्थानांतरण शुरू हो गया है।
संचारबंदी के दौरान 5 से ज्यादा लोगों को एक स्थान पर इकट्ठा होने पर दंडात्मक कार्रवाई की जा रही है। काम छीन जाने से श्रमिकों को शहर छोड़ते हुए देखा जा रहा है। निर्माण कार्य मजदूर फिलहाल काम कर रहे हैं क्योंकि बिल्डरों की साइट शुरू हैं। कारखाने में भी, श्रमिकों को दैनिक टेस्टिंग के आधार पर काम पर रखा जा रहा है। कॉर्पोरेट क्षेत्र में अधिकांश काम घर से किया जा रहा है। हालांकि होटल, दुकानों और स्टेशनरी के साथ-साथ अन्य व्यवसायों में श्रमिकों के पास शहर छोड़ने के अलावा कोई विकल्प नहीं है।
मजदूरों ने यह कहते हुए कदम पीछे खींच लिए हैं कि अगर तालाबंदी में ज्यादा कड़े प्रतिबंध हुए तो खाने के लाले पड़ जाएंगे। निर्माणकार्य क्षेत्र में भी, नौकरी के पर्याप्त अवसर नहीं हैं, केवल कुछ मुट्ठी भर श्रमिक अभी भी काम कर रहे हैं। श्रमिक अपना रोजगार को खोने के डर से इसे बनाए रखने की कोशिश कर रहे हैं। मजदूरों के बच्चों के लिए स्कूली शिक्षा का मुद्दा भी बढ़ रहा है।
होटल व्यवसाय के साथ-साथ कैंटीन के श्रमिकों को भी निर्माणकार्य में काम करने की नौबत आयी है। मगर आठ दिन काम मिलेगा ही यह निश्चित नहीं है नतीजन कमरे के किराए का भुगतान करना मुश्किल हो गया है। उनके पास कोई विकल्प नहीं है। कई लोग जल्द ही हालात सामान्य होने का इंतजार कर रहे हैं।ब्रेक द चेन के  कारण, बड़े व्यवसायियों की साइटें बंद हो गई हैं और श्रमिकों के हाथ में काम नहीं रहे हैं।  अस्तित्व के बारे में चिंता अभी बढ़ रही है। फैक्ट्री से जीवनावश्यक वस्तुओं को  लाया जा रहा है। शहर में युवाओं को रोजगार देने वाले व्यवसायों को बंद करने के कारण बेरोजगारी बढ़ी है। कारखाने में मजदूरी और अन्य काम मुश्किल लगता है। इसलिए ज्यादातर युवाओं ने गांव जाने का फैसला किया है।
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