उद्यान के लिए भूखंड का श्रीखंड कौन खायेगा? विधायक सुनील शेलके का सवाल 

पिंपरी। मशहूर पर्यटन स्थल लोनावला के नगरपरिषद के करीबन 11 करोड़ 60 लाख रुपए खर्च से उद्यान के लिए भूखंड खरीदने का फैसला किया है। इस फैसले पर सवाल उठाते हुए मावल विधानसभा क्षेत्र से राष्ट्रवादी कांग्रेस के विधायक सुनील शेलके ने कहा कि, उद्यान के नाम पर भूखंड का श्रीखंड कौन चखेगा? इसकी जांच होने तक संबंधितों को जमीन का आर्थिक मुआवजा न दिया जाय। उन्होंने इस बारे में पुणे के जिलाधिकारी राजेश देशमुख को एक खत लिखा है जिसमें सर्वेक्षण के आदेश देने और परोक्ष निरीक्षण करने की मांग भी की गई है।
विधायक शेलके ने अपने खत में कहा है कि, लोनावला नगरपरिषद की ओर से 14 जनवरी 2019 को एक विशेष बैठक आयोजित की गई थी। इसमें उद्यान के लिए सर्वे नंबर 39 में भूखंड आरक्षित करने का निर्णय लिया गया था। यह रायवुड पार्क और शिवाजी गार्डन से कुछ दूरी पर भूमि के एक भूखंड को आरक्षित करने की योजना है। बड़ा सवाल यह है कि इससे नागरिकों को कितना फायदा होगा क्योंकि सभी उद्यान एक ही जगह आ रहे हैं। नगरपरिषद के पार्षद शादन चौधरी, सेजल परमार, शिवदास पिल्ले, कल्पना अखाडे, अंजना कडु, सिंधु परदेशी, सुनील इंगुलकर और नितिन अग्रवाल ने उन मानदंडों पर सवाल उठाया है, जिन पर प्रस्तावित जमीन का चयन किया गया है।
मूलतः यह जमीन गत कई सालों से विवादों के घेरे में है। प्रस्तावित साइट सर्वेक्षण संख्या 39 में है और इसका क्षेत्रफल 68 गुंठा है। इस स्थान के बीच में दो उच्च वोल्टेज बिजली की लाइनें चल रही हैं, जिससे यहां के विकास कार्य में बाधा आ सकती है। सरकार बिजली लाइन से दोनों तरफ नौ मीटर की जगह में किसी भी तरह के विकास की अनुमति नहीं देती है। विधायक शेलके ने पत्र में कहा कि बड़ा सवाल यह है कि नगरपालिका इस क्षेत्र में पार्क कैसे विकसित करेगी क्योंकि बिजली लाइनें क्षेत्र के बीच से गुजरती हैं। संबंधित जमीन परोक्ष में कितनी इस्तेमाल में लायी जा रही है, उतना ही मुआवजा दिया जाना चाहिए। इस जमीन का फेरमूल्यांकन किया जाय और यह पूरी प्रक्रिया होने तक संबंधित जमीन के लिए आर्थिक मुआवजा न दिया जाय। जैसा कि प्रस्तावित पार्क साइट टाटा डैम की दीवार के पास है, सरकार सुरक्षा कारणों से लगभग 30 से 35 मीटर की दूरी पर विकास की अनुमति नहीं देती है।  असली सवाल यह है कि कुल 68 गुंठा क्षेत्र होने पर इसमें से कितना क्षेत्र उपयोग में लाया जाएगा। फिर क्यों पूरे 68 गुंठा की जमीन का भुगतान किया जाना चाहिए? यह सवाल भी उन्होंने उठाया है।
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