Pune | एक सदस्यीय वार्ड प्रणाली से पुणे मनपा चुनाव में किसका फायदा और किसका नुकसान ?

पुणे मनपा चुनाव

पुणे (Pune News) : Pune | राज्य चुनाव आयोग (State Election Commission) द्वारा आगामी 18 मनपा चुनावों (Municipal Elections) के लिए प्रभाग के बजाय एक सदस्यीय वार्ड प्रणाली की घोषणा के साथ ही आगामी मनपा चुनाव के सभी राजनीतिक गणित बदल गए हैं। इस फैसले से शिवसेना (Shiv Sena), कांग्रेस (Congress) और मनसे (MNS) को फायदा हो सकता है, लेकिन भाजपा (BJP) को नुकसान हो सकता है, क्योंकि वार्ड का आकार प्रभाग से छोटा होता है और भाजपा का पारंपरिक मतदाता काफी हद तक बिखरा हुआ है। इसलिए 2017 में राज्य (Pune) में मनपा चुनाव कराने वाली फडणवीस सरकार (Fadnavis Government) द्वारा एक प्रभाग व्यवस्था यानी 4 वार्डों का विलय करने से बीजेपी को काफी फायदा हुआ था।

 

मिनी विधानसभा के रूप में पहचाने जानेवाले पुणे, नासिक, औरंगाबाद, सोलापुर और नागपुर में 2017 के मनपा चुनाव में सत्ता में आई थी, लेकिन राज्य में महाविकास आघाडी सरकार (Maha Vikas Aghadi Govt.) की सत्ता आने के बाद विद्यमान सरकार ने कानून में बदलाव कर फिर से एक सदस्यीय वार्ड पद्धति लेकर आई। इसमें राष्ट्रवादी को दो सदस्यीय प्रभाग चाहिए थी लेकिन वो दुरुस्ती अध्यादेश निकल नहीं पाया। क्योंकि, कांग्रेस और शिवसेना को सिंगल वार्ड सिस्टम चाहिए। इसलिए अभी तक इस पर कोई सहमति नहीं बन पाई है और अब राज्य चुनाव आयोग (state election commission) ने फिर से 18 मनपा को पुरानी एक सदस्यीय वार्ड प्रणाली के अनुसार वार्डों का पुनर्गठन करने का आदेश दिया है।

 

 पुणे (Pune) में भी एक सदस्यीय वार्ड प्रणाली (Member Ward System) के साथ होने के कारण सभी गणित बदल गए हैं। कांग्रेस, राष्ट्रवादी, मनसे ने इसका स्वागत किया है, क्योंकि तीनों दलों के नगरसेवक अपने-अपने बल पर चुनकर आते थे, वहीं दूसरी ओर चूंकि भाजपा नगरसेवक लहर के कारण चुन कर आ रहे थे, इसलिए वार्ड व्यवस्था उनके लिए बहुत फायदेमंद थी। इसलिए पुणे भाजपा (Pune BJP) ने वार्ड व्यवस्था के आधार पर गठबंधन सरकार की आलोचना की। भाजपा के शहराध्यक्ष जगदीश मुलिक (Jagdish Mulik) का दावा है कि आप चाहे जैसा भी चुनाव कराएं, हम ही जीतेंगे।

 

इस बीच, इस एक सदस्यीय वार्ड प्रणाली से गुंडे, निर्दलीय, बागी के चुनाव जीतने की संभावना बढ़ जाती है। क्योंकि निर्वाचन क्षेत्र और मतदाताओं की संख्या 20 हजार तक सीमित होती है। चूंकि प्रभाग प्रणाली में चार वार्डों को जोड़ा जाता है, मतदाताओं की संख्या लगभग 80,000 है, जिससे सड़कों के रॉबिनहुड नगरसेवकों का निर्वाचित होना मुश्किल हो जाता है। चार वार्डों में पार्टी के वोट एक साथ आने से, भाजपा जैसी राष्ट्रीय पार्टी सभी चार वार्ड पार्षदों का चुनाव आसानी से कर सकती है।

 

लेकिन अब जब पुरानी वार्ड व्यवस्था फिर से शुरू हो गई है, तो मनपा चुनावों (municipal elections) में पार्टी का प्रभाव कुछ हद तक सीमित हो जाएगा, ऐसा कांग्रेस के गुट नेता आबा बागुल ने कहा। इस बीच, राज्य में सत्ताधारी दल अपनी सुविधानुसार वार्डों का पुनर्गठन कर सकता है।

 

पुणे (Pune) में भले ही 23 गांव शामिल हो गए, लेकिन नगरसेवकों की संख्या 164 से बढ़कर केवल 166 हो जाएगी। क्योंकि, 2011 की जनगणना के अनुसार वार्डों का पुनर्गठन किया जा रहा है। इसलिए सत्ताधारी भाजपा को बगावत का सामना करना पड़ सकता है।

भाजपा के शहराध्यक्ष जगदीश मुलिक ने दावा किया कि किसी भी हाल में हम सत्ता में वापस आएंगे। वहीं राष्ट्रवादी के शहराध्यक्ष प्रशांत जगताप दावा कर रहे हैं कि इस बार चाहे कुछ भी हो जाए, हम पुणे मनपा (Pune Municipal Corporation) में सत्ता में आएंगे। इसलिए, निकट भविष्य में यह स्पष्ट हो जाएगा कि इस वार्ड प्रणाली से किस पार्टी को लाभ होता है और किसका इसका नुकसान होता है।

 

 

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