Pune Cyber Crime | पुणे स्‍वास्‍थ्‍य विभाग के पेपर लीक मामले में केस दर्ज ; जांच में 100 में से 92 प्रश्‍न समान पाए गए

पुणे : Pune Cyber Crime | स्‍वास्‍थ्‍य विभाग (Health Department) द्वारा अलग-अलग पदों के लिए ली गई परीक्षा में से 31 अक्‍टूबर को आयोजित चतुर्थ श्रेणी के पदों (class IV post) की भर्ती के तहत हुई लिखित परीक्षा का पेपर लीक होने की बात आखिरकार स्‍वास्‍थ्‍य विभाग ने मान ली है. स्‍वास्‍थ्‍य विभाग की प्रमुख प्रशासनिक अधिकारी स्मिता कारेगांवकर (Smita Karegaonkar) ने इस मामले में साइबर पुलिस (cyber police) से शिकायत की है. शिकायत के आधार पर पुलिस ने धारा 406, 420, 34 सहित यूनिवर्सिटी, बोर्ड व अन्‍य परीक्षा में होने वाली गड़बड़ी (Pune Cyber Crime) पर रोक लगाने के लिए धारा 6 और 8 के अनुसार अज्ञात लोगों के खिलाफ केस (Case) दर्ज किया गया है.

 

स्‍वास्‍थ्‍य विभाग ने कुल 7 हजार 343 पदों के लिए परीक्षा की घोषणा की थी. उसी वक्‍त से यह परीक्षा विवादों में घिर गई थी. परीक्षा की व्‍यवस्‍था ट्रस्‍ट और कंपनी को सौंपी गई थी. जबकि इस कंपनी को लेकर कई तरह के विरोध जताए गए थे. कमजोर व्‍यवस्‍था की वजह से ऐन परीक्षा के वक्‍त सुख-सुविधाएं उपलब्‍ध नहीं होने के कारण कुछ परीक्षा आगे बढ़ा दी गई थी.

 

स्‍वास्‍थ्‍य विभाग के चतुर्थ श्रेणी के पदों के लिए चयन प्रक्रिया (Selection Process) में लिखित परीक्षा 31 अक्‍टूबर की दोपहर 2 से 4 बजे तक होनी थी. लेकिन इस परीक्षा का पेपर उसी दिन सुबह साढ़े आठ बजे वायरल हो गया था. अधिकांश को यह पेपर व्हाट्सएप पर मिल गया था. एक पेपर पर प्रश्‍न और उत्‍तर लिखा पेपर लीक हुआ था. पेपर लीक की शिकायत करने विधार्थी पुलिस स्‍टेशन (police station) गए थे. लेकिन इस मामले में स्‍वास्‍थ्‍य विभाग द्वारा कोई जानकारी नहीं दिए जाने की वजह से केस दर्ज नहीं हो पाया था. अब खुद स्‍वास्‍थ्‍य विभाग ने पेपर लीक की बात मान ली है.

 

शिकायत में कहा गया है कि लिखित परीक्षा के 100 प्रश्नों  में से 92 प्रश्‍न व उत्‍तर वाला पेपर लीक कर इसकी जानकारी प्रसारित कर सरकार और परीक्षा में बैठने वाले विद्यार्थियों के साथ ठगी की गई.

 

उस वक्त इस मामले में स्‍वास्‍थ्‍य विभाग द्वारा चुप्पी साध लेने की वजह से विद्यार्थियों के विरोध के बावजूद केस दर्ज नहीं किया गया था. पेपर लीक की वजह से हजारों विधार्थियों के ईमानदार मेहनत को तगड़ा झटका लगा था. अब इस मामले में खुद स्‍वास्‍थ्‍य विभाग के सामने आने पर सवाल उठ रहा है कि आखिर उस वक्‍त विभाग ने विद्यार्थियों का साथ क्यों नहीं दिया था और मामले को गंभीरता से क्यों नहीं लिया ?

 

 

 

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