विश्व भारती की जमीन पर अतिक्रमण करने वालों में नोबेल पुरस्कार विजेता अमर्त्य सेन का भी नाम 

कोलकाता. ऑनलाइन टीम : गुरुदेव रवींद्रनाथ टैगोर की विश्व-भारती अतिक्रमणकारियों की चंगुल में है। दर्जनों भूखंडों पर कई निजी लोगों ने गलत तरीके से कब्जा कर रखा है।  अवैध कब्जेदारों की लिस्ट में नोबेल पुरस्कार विजेता और प्रख्यात अर्थशास्त्री प्रोफेसर अमर्त्य सेन का भी नाम शामिल है। प्रोफेसर सेन  पर आरोप है कि उन्होंने 13 डिसमिल जमीन पर अनधिकृत कब्जा कर रखा है। प्रोफेसर सेन ने 2006 में 99 साल की लीज-होल्ड भूमि को अपने नाम पर ट्रांसफर करने के लिए तत्कालीन कुलपति को लिखा था। कार्यकारी परिषद के फैसले के बाद यह हो गया, लेकिन अतिरिक्त भूमि विश्वविद्यालय को सेन ने वापस नहीं की। जवाब में प्रो. सेन ने अपने ईमेल में कहा, ‘शांतिनिकेतन में जन्म लेने और यहां पले-बढ़े होने के कारण मैं यह कह सकता हूं कि शांतिनिकेतन की संस्कृति और कुलपति के बीच बड़े अंतर हैं। वीसी दिल्ली में केंद्र सरकार की ओर से नियुक्त किए गए हैं वह पूरे बंगाल को नियंत्रित करना चाहते हैं।’

बता दें कि विश्वविद्यालय 1,132 एकड़ भूमि पर बनाया गया है, जिसमें से 77 एकड़ जमीन पर अतिक्रमण है। विश्वविद्यालय ने कानूनी लड़ाई और अतिक्रमण हटाकर हाल के दिनों में 22 एकड़ जमीन वापस पाई है। विश्वभारती के संपदा कार्यालय के अनुसार ऐसे गलत रेकॉर्ड 1980 और 1990 के दशक में तैयार किए गए थे। इन भूखंडों में से अधिकांश शांतिनिकेतन के पुरवापल्ली इलाके में स्थित हैं, जो कि आश्रमियों के आवासीय हब के रूप में जाना जाता है। विश्व-भारती के कार्यालयों के दस्तावेज और सीएजी की वह रिपोर्ट शिक्षा मंत्रालय (एमओई) को भेजी है जिसमें विश्वविद्यालय की भूमि के अतिक्रमण को 1990 के दशक के अंत में होना बताया गया है।

विश्वविद्यालय का आरोप है कि सरकार के रेकॉर्ड-ऑफ-राइट (RoR) में गलत स्वामित्व दर्ज करने के कारण, विश्वविद्यालय की भूमि को अवैध रूप से ट्रांसफर कर दिया गया है और प्राइवेट लोगों ने रबींद्रनाथ टैगोर द्वारा खरीदी गई भूमि पर रेस्तरां, स्कूल और अन्य व्यवसाय खोल लिए हैं। रिपोर्ट में कहा गया है कि ये बहुत ही हाई प्रोफाइल लोग हैं। वहीं वीसी बिद्युत चक्रवर्ती ने इस मामले पर टिप्पणी करने से इनकार कर दिया। जानकारी के अनुसार,  वर्तमान में अधिकांश वारिस गैर-निवासी शांतिनिकेतन हैं, जो परिसर में प्रमुख भूमि के बड़े हिस्से पर कब्जा किए हुए हैं। कई व्यवसाय कर रहे हैं। ये लोग इन जमीनों को विश्वविद्यालय परिसर के तौर पर नहीं देखते हैं।

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