फिर वार्ता बेनतीजा…सरकार कुछ झुकी भी तो किसान अड़े रहे, सभी प्रस्ताव ठुकराया

नई दिल्ली. ऑनलाइन टीम : आखिर जिसका डर था, वही बात हो गई। सरकार के साथ किसानों की बात फिर नहीं बनी और बैठक बेनतीजा खत्म हो गईं। 56वें दिन ऐसा लगा था कि जारी गतिरोध टूट जाएगा। दोनों ही ओर से कुछ-कुछ बातें मान ली जाएंगी, लेकिन ऐसा नहीं हुआ। बैठक के दौरान सरकार ने एक साल तक कानून निलंबन का प्रस्ताव दिया था, जिसे किसान संगठनों ने नामंजूर कर दिया।इसके अलावा केंद्र सरकार की तरफ से नई कमेटी के गठन का प्रस्ताव भी किसानों ने ठुकरा दिया।

लंच से पहले तक बातचीत का कोई नतीजा नहीं निकल पाया। किसान कानून वापसी पर ही अड़े रहे, तो सरकार ने भी कानूनों में बदलाव की बात दोहराई थी। किसानों ने कहा कि सरकार न्यूनतम समर्थन मूल्य पर चर्चा से भाग रही है। किसान नेताओं ने आंदोलन से जुड़े लोगों को नेशनल इन्वेस्टिगेशन एजेंसी की तरफ से नोटिस भेजने का भी विरोध किया। इस पर मंत्रियों ने कहा कि इस बारे में पता करेंगे। सब कुछ सकारात्मक ही चल रहा था और ऐसा लगा कि किसान मान
जाएंगे, लेकिन उनके तेवर अचानक बदल गए। वे जिद पर अड़ गए।

कहा-कृषि कानूनों को रद्द करने के अलावा हम कुछ भी नहीं सुनेंगे, तो सरकार ने भी साफ कर दिया है कि कानून किसी भी कीमत पर वापस नहीं लिया जाएगा। संशोधन की बात कुछ मानी जा सकती है। दूसरी तरफ, सुप्रीम कोर्ट ने भी सख्त तेवर अपनाए। जैसे ही एक हलफनामे में किसानों ने कहा कि सुप्रीम कोर्ट द्वारा नियुक्त सदस्य, किसानों को समान मापदंडों पर कैसे सुनेंगे, जब उन्होंने पहले से ही इन तीनों कृषि कानून का समर्थन किया हुआ है, इस पर सुप्रीम कोर्ट ने भारी नाराजगी जताई।

मुख्य न्यायाधीश एसए बोबड़े ने सुनवाई के दौरान कहा- “हमने समिति में विशेषज्ञों को नियुक्त किया है, क्योंकि हम विशेषज्ञ नहीं हैं। आप समिति में किसी पर संदेह कर रहे हैं क्योंकि उसने कृषि कानूनों पर विचार व्यक्त किए हैं? इसमें पक्षपात कहां से आ गया। वे कृषि क्षेत्र में प्रतिभाशाली दिमाग वाले लोग हैं। आप उनका नाम कैसे मलिन कर सकते हैं? बता दें कि इस कोर्ट की बनाई कमिटी में अशोक गुलाटी, अनिल घनवट, भूपिंदर सिंह मान और प्रमोद जोशी के नाम थे। बाद में अखिल भारतीय किसान समन्वय समिति के अध्यक्ष भूपिंदर सिंह मान ने “किसानों के हितों” का हवाला देते हुए खुद को पैनल से हटा लिया था।

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