अरूणाचल प्रदेश के पूर्व राज्यपाल माता प्रसाद ने 95 साल में ली अंतिम सांस

नई दिल्ली. ऑनलाइन टीम : अरूणाचल प्रदेश के पूर्व राज्यपाल माता प्रसाद का मंगलवार को आधी रात के बाद  नई दिल्ली के संजय गांधी स्नातकोत्तर आयरुविज्ञान संस्थान (एसजीपीजीआई) में निधन हो गया। वह 95 साल के थे। उन्हें मंगलवार शाम को संजय गांधी पोस्ट ग्रेजुएट इंस्टीट्यूट ऑफ मेडिकल साइंसेज (एसजीपीजीआईएमएस) में कई अंगों के काम बंद करने के बाद भर्ती कराया गया था।

माता प्रसाद उत्तर प्रदेश के जौनपुर जिले के रहने वाले थे। जौनपुर जिले के मछली शहर तहसील क्षेत्र के कजियाना मोहल्ले में 11 अक्टूबर 1924 को जगरूप राम के पुत्र के रूप में जन्मे माता प्रसाद 1942 – 43 में मछलीशहर से हिंदी-उर्दू में मिडिल परीक्षा पास की । गोरखपुर के नॉर्मल स्कूल से ट्रेनिंग के बाद जिले के मडियाहू क्षेत्र के प्राइमरी स्कूल बेलवा में सहायक अध्यापक के रूप में कार्य करते हुए उन्होंने गोविंद , विशारद के अलावा हिंदी साहित्य की परीक्षा पास की।

अध्यापन काल में ही ये लोकगीत लिखना और गाना इनका शौक हो गया था । इनकी कार्य कुशलता को देखते हुए इन्हें 1955 में जिला कांग्रेस कमेटी का सचिव बनाया गया। उन्होंने 1988- 89 में यूपी में कांग्रेस सरकार में मंत्री के रूप में कार्य किया और 1993 में अरुणाचल प्रदेश के राज्यपाल नियुक्त हुए। राजनीति में बाबू जगजीवन राम को अपना आदर्श मानने वाले माता प्रसाद शाहगंज (सुरक्षित) विधानसभा क्षेत्र से कांग्रेस के टिकट पर 1957 से 1974 तक लगातार पांच बार विधायक रहे। 1980 से 1992 तक उत्तर प्रदेश विधान परिषद के सदस्य रहे।

उत्तर प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री नारायण दत्त तिवारी ने इन्हें अपने मंत्रिमंडल में 1988 से 89 तक राजस्व मंत्री बनाया था। वहीं केंद्र की नरसिंह राव सरकार ने 21 अक्टूबर 1993 को इन्हें अरुणाचल प्रदेश का राज्यपाल बनाया और 31 मई 1999 तक यह राज्यपाल रहे। राज्यपाल पद पर रहते हुए उनको तत्कालीन गृह मंत्री लालकृष्ण आडवाणी ने पद छोड़ने को कहा तो उन्होंने दरकिनार कर दिया था। वे एक साहित्यकार के रूप में भी जाने जाते रहे हैं। उन्होंने एक दर्जन से ज्यादा किताबें लिखी हैं। एकलव्य खंडकाव्य , भीम शतक प्रबंध काव्य , राजनीत की अर्थ सतसई, परिचय सतसई, दिग्विजयी रावण जैसी काव्य कृतियों की रचना ही नहीं की वरन अछूत का बेटा , धर्म के नाम पर धोखा , वीरांगना झलकारी बाई , वीरांगना उदा देवी पासी , तड़प मुक्ति की , धर्म परिवर्तन प्रतिशोध , जातियों का जंजाल , अंतहीन बेड़ियां , दिल्ली की गद्दी पर खुसरो भंगी जैसे नाटक इनमें प्रमुख हैं। राज्यपाल रहते उन्होंने मनोरम अरुणाचल पूर्वोत्तर भारत के राज्य , झोपड़ी से राजभवन आदि उल्लेखनीय कृतियां लिखी हैं।
सादगी की प्रतिमूर्ति रहे माता प्रसाद ने उन राजनेताओं को आईना दिखाया है,जो आज के दौर में एक बार विधायक या मंत्री बनते ही गाड़ी बंगले और धन संपदा के फेर में लग जाते है,वही पांच बार विधायक,दो बार एमएलसी,उत्तर प्रदेश के राजस्व मंत्री और राज्यपाल रहे माता प्रसाद पैदल या रिक्शे पर बैठे बाजार से सामान खरीदते देखे जाते थे , पैदल चलना उनकी आदत थी।

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