डीएसके मामले में रवींद्र मराठे की मुश्किलें फिर बढ़ीं; जमानत को चुनौती

मुंबई । पुणे समाचार

डीएसके मामले में बैंक ऑफ महाराष्ट्र के मुख्य कार्यकारी अधिकारी और सीएमडी रविंद्र मराठे की मुश्किलें कहीं कम होती नजर नहीं आ रही। उन्हें पुणे सत्र न्यायालय द्वारा मंजूर की गई जमानत पर कड़ी आपत्ति जताते हुए मुंबई उच्च न्यायालय में चुनौती दी गई है। बैंक के निवेशक प्रज्ञा सामंत और श्रीधर ग्रामोपाध्ये ने उच्च न्यायालय में याचिका दायर कर मराठे की जमानत खारिज करने की मांग की है। इस याचिका पर हुई सुनवाई में न्यायमूर्ति साधना जाधव की बेंच ने राज्य सरकार को 3 अगस्त तक जवाब देने के आदेश दिए गए हैं।

याचिका में कहा गया है कि, डीएसके ने हजारों निवेशकों के साथ धोखाधड़ी की है, उनके इस गबन में बैंक ऑफ महाराष्ट्र के अध्यक्ष रविन्द्र मराठे की सहभागिता भी स्पष्ट होती है। उन्होंने डीएसके की आर्थिक क्षमता और विश्वसनीयता की परख किये बिना उनकी कंपनियों को बड़े कर्ज मंजूर किये। यह मराठे की इस धोखाधड़ी में सहभागिता साफ नजर आती है। आर्थिक अपराध शाखा द्वारा उन्हें गिरफ्तार किए जाने के बाद पुणे की अदालत ने सात दिन की पुलिस कस्टडी में भेजने का आदेश दिया। मगर गिरफ्तारी के दूसरे ही दिन मराठे और बैंक के दूसरे उच्चाधिकारियों की कस्टडी न्यायिक हिरासत में तब्दील कर दी गई।

यही नहीं मराठे की तबीयत बिगड़ने पर उन्हें सरकारी की बजाय निजी अस्पताल में दाखिल कराया गया। इस पर भी आपत्ति जताते हुए याचिकाकर्ताओं ने कहा है कि, पुलिस कस्टडी खत्म होने से पहले ही छुट्टी के दिन शाम को अदालत का कामकाज चलाकर सुनवाई की गुजारिश करना, उसके बाद अदालत में भी जमानत अर्जी के दर्ज हुए बिना तत्काल सुनवाई लेकर फैसला करने, मेडिकल बोर्ड के दाखिले के बिना ही मराठे को मेडिकल ग्राउंड पर न्यायिक हिरासत में भेजना, इस पूरे मामले में विशेष सरकारी वकील प्रवीण चव्हाण को अनजान रखने जैसी तमाम गतिविधियां सन्दिग्ध है।

इससे न्याय प्रक्रिया पर भी विपरीत असर हुआ है। जांच एजेंसी पर ऐसा कौन सा और किसका दबाव है जिसके चलते मराठे और दूसरे अधिकारियों की जमानत के लिए जल्दबाजी मचाई गई? यह सवाल भी उठाया गया है। इस पर उच्च न्यायालय ने राज्य सरकार को 3 अगस्त तक अपना पक्ष रखने के आदेश दिये हैं। इससे बैंक ऑफ महाराष्ट्र के सीएमडी रविंद्र मराठे और पुणे पुलिस की दिक्कतें बढ़ गई हैं।

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