एसिड अटैक पीड़ित के लिए नमक के इस्तेमाल से बनाई कृत्रिम त्वचा ;पाक के डॉक्टर ने की क्रन्तिकारी खोज :

  • आज की प्लास्टिक सर्जरी की तुलना में बेहद सस्ता
  • स्किन की प्रति वर्ग इंच की कीमत 63 हजार रुपए (900 डॉलर) से घटकर सिर्फ 350 रुपए (पांच डॉलर) हो जाएगी

समाचार ऑनलाइन – पाकिस्तान के डॉक्टर रऊफ अहमद द्वारा कृत्रिम त्वचा बनाने का सफल अविष्कार किया गया है, जो की आज की प्लास्टिक सर्जरी के खर्च की तुलना में कम और आसन है. इस खोज की खास बात यह है कि ये कृत्रिम त्वचा लैब में बनाई गई है. यह उन लोगों के लिए बेहद है सकून और राहत भरी खबर है जो एसिड अटैक पीड़ित है या जिसकी किसी दुर्घटना में स्किन डैमेज हुई है.

क्यों इस शोध को कहा जा रहा है क्रान्तिकारी

प्राप्त जानकारी के अनुसार यह शोध बेहद ही खास है क्योंकि स्किन सेल्स बनाने में लाहौर के डॉ. रऊफ ने ट्राइपीजाइन एंजाइम की जगह सोडियम क्लोराइड यानी नमक का इस्तेमाल किया। बताते चले कि स्किन सेल्स बनाने के लिए ट्राइपीजाइन एंजाइम का इस्तेमाल किया जाता है.

एसिड अटैक के पीड़ितों के वरदान

आज के समय में प्लास्टिक सर्जरी करवाना कई गुना महंगा पड़ता है। अभी जलने पर लोगों का इलाज शरीर के दूसरे हिस्सों निकाली गई अथवा किसी डोनर से ली गई त्वचा से होता है। किसी मरीज के खुद के शरीर से त्वचा को निकालना काफी महंगा पड़ता है. जबकि डोनर द्वारा दी जाने वाली त्वचा को लंबे समय तक सुरक्षित रखना चुनौती होता है। जबकि अब इस तरह से बनी त्वचा को दो साल तक स्टोर भी किया जा सकता है।

आज की प्लास्टिक सर्जरी की तुलना में बेहद सस्ता

कहा जा रहा है कि डॉ रऊफ के प्रयोग से कृत्रिम त्वचा उगाने का खर्च 63 हजार रुपए (900 डॉलर) प्रति वर्ग इंच की जगह अब 350 रुपए (पांच डॉलर) प्रति इंच हो गया है. खासतौर पर गरीब तबके, गांवों या छोटे शहरों के पीड़ित इस खर्च को उठाने में अब सक्षम हों जाएंगे।

गुणवत्ता में भी आगे

डॉ. रऊफ ने पिछले साल अक्टूबर में एसिड अटैक से पीड़ित लोगों पर इसका परीक्षण शुरू किया है. आगामी दो महीनों में सम्बन्धित सभी टेस्ट पूरे हो जाएंगे. लाहौर की यूनिवर्सिटी ऑफ हेल्थ साइंस के वीसी प्रो. जावेद इकराम ने भी पाकिस्तान में बनी यह कृत्रिम त्वचा की गुणवत्ता को सबसे बेहतर बताया है.

उल्लेखनीय है कि डॉ. रऊफ ने सबसे पहले जानवरों पर इस कृत्रिम त्वचा का परीक्षण किया था, जो की सफल साबित हुआ. इसके बाद अब उन्होंने एसिड अटैक पीड़ितों पर प्रयोग शुरू किया है.

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