4G के दाम पर ही 5G सेवा… भारत में दिसंबर तक लॉन्चिंग का अनुमान

ऑनलाइन टीम. नई दिल्ली : पिछले करीब 2 सालों से 5 जी की चर्चा हो रही है। चीन, अमेरिका, जापान और यहां तक कि दक्षिण कोरिया जैसे देशों में इसका इस्तेमाल शुरू हो चुका है। देश में दिसंबर तक 5G सर्विसेज शुरू हो सकती हैं। खास बात ये है कि 4G के रेट पर ही लोगों को 5G की सुविधाएं भी मिल जाएंगी। इससे इंटरनेट की स्पीड 15 गुना ज्यादा बढ़ जाएगी। पलक झपकते ही बड़ी से बड़ी साइज का वीडियो और फिल्म डाउनलोड हो जाएगी।

5G के क्या-क्या फायदे?

-इंटरनेट की स्पीड 10 से 15 गुना बढ़ जाएगी।
-इसकी मदद से कार, स्मार्ट सिटी, रोबोट भी कंट्रोल कर सकेंगे।
-हॉस्पिटल्स, होटल्स, ट्रैफिक सुविधाओं को ऑनलाइन कंट्रोल किया जा सकेगा।
-रेडिएशन से किसी को कोई खतरा नहीं

5G टेक्नोलॉजी का आधार पांच तकनीकों से बनता है

मिलीमीटर-वेव 5G : मिलीमीटर-वेव 5G बहुत सारा डेटा एक्वॉयर करता है, जो 1 जीबी प्रति सेकेंड की स्पीड से डेटा ट्रांसफर को संभव बनाता है। ऐसी तकनीक फिलहाल अमेरिका में वेरीजॉन और AT&T जैसे टेलीकॉम ऑपरेटर इस्तेमाल कर रहे हैं।

स्पीड सेल्स : 5G टेक्नोलॉजी का दूसरा आधार स्पीड सेल्स है।  इन छोटे सेल को परंपरागत टावर की तुलना में कम दूरी पर रखा जाता है ताकि यूजर्स को बिना किसी रुकावट के 5G सिग्नल मिल सके।

मैक्सिमम MIMO : 5G टेक्नोलॉजी का अगला आधार है मैक्सिमम MIMO, यानी मल्टीपल-इनपुट और मल्टीमल आउटपुट टेक्नोलॉजी। इस तकनीक का इस्तेमाल कर ट्रैफिक को मैनेज करने के लिए बड़े सेल टावर्स का इस्तेमाल किया जाता है। एक रेगुलर सेल टावर जिससे 4G नेटवर्क मिलता है, वो 12 एंटीना के साथ आता है जो उस क्षेत्र में सेल्युलर ट्रैफिक को हैंडल करता है।

बीमफॉर्मिंग : बीमफॉर्मिंग एक ऐसी तकनीक है जो लगातार फ्रीक्वेंसी की कई सारे सोर्सेस को मॉनिटर कर सकती है और एक सिग्नल के ब्लॉक रहने पर दूसरे मजबूत और अधिक स्पीड वाले टावर पर स्विच करती है। यह सुनिश्चित करती है कि खास डेटा सिर्फ एक खास दिशा में ही जाए।

फुल डुप्लेक्स : फुल डुप्लेक्स एक ऐसी तकनीक है, जो एक समान फ्रीक्वेंसी बैंड में एक साथ डेटा को ट्रांसमिट और रिसीव करने में मदद करता है। लैंडलाइन टेलीफोन और शॉर्ट वेव रेडियो में इस तरह की तकनीक का इस्तेमाल होता है। यह टू-वे स्ट्रीट की तरह है, जो दोनों तरफ से समान ट्रैफिक भेजता है।

5G की चुनौतियां :

-5G टेक्नोलॉजी को लाना काफी महंगा होने वाला है। नेटवर्क ऑपरेटर्स को मौजूदा सिस्टम हटाना पड़ेगा, क्योंकि इसके लिए 3.5Ghz से अधिक फ्रीक्वेंसी की जरूरत होती है, जो 3G या 4G में इस्तेमाल होने वाले से बड़ा बैंडविड्थ है।

गलतफहमी दूर : 

जानकारों का मानना है कि इसके रेडिएशन से कोई नुकसान नहीं होगा। यह नॉन आयोनाइजिंग रेडिएशन पर काम करेगा। इतना जरूर है कि इसके ज्यादा देर इस्तेमाल से मोबाइल गर्म हो सकता है। इस रेडिएशन का यूज एफएम रेडियो, टेलीविजन, पुलिस के वायरलेस सिस्टम के लिए होता है।  भारत में सबसे पहले रिलायंस जियो 5G को लॉन्च कर सकती है। अमेरिकी टेक्नोलॉजी फर्म क्वालकॉम के साथ मिलकर रिलायंस जियो, अमेरिका में अपनी 5G टेक्नोलॉजी का सफल ट्रायल कर चुकी है।

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