2 केन्द्रीय मंत्रालय मिलकर योजनाओं का लाभ पहुंचाएंगे

नई दिल्ली , 8 अप्रैल (आईएएनएस)। आम लोगों को सरकारी योजनाओं का सीधा लाभ पहुंचाने के लिए खाद्य प्रसंस्करण उद्योग मंत्रालय और ग्रामीण विकास मंत्रालय दोनों मिलकर खाद्य प्रसंस्करण के क्षेत्र में स्व-सहायता समूह के जरिये अपनी कई योजनाओं को मिलाकर काम करेंगे।

दोनों मंत्रालयों के बीच विशेष तौर पर केन्द्र सरकार की ओर से चलाई जा रही सूक्ष्म खाद्य प्रसंस्करण से जुड़ी (प्रधानमंत्री-एफएमई) योजना पर केंद्रित किया गया है। साल 2020-21 से 2024 के बीच पांच साल की अवधि में अखिल भारतीय स्तर पर योजना लागू की जाएगी। इसपर 10 हजार करोड़ रुपये का आउटले रखा गया है।

खाद्य प्रसंस्करण उद्योगों के समर्थन देने के लिए (प्रधानमंत्री-एफएमई) योजना को पिछले साल 29 जून को शुरू किया गया था। ये योजना आात्मर्निभर भारत अभियान का हिस्सा और प्रधान मंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा शुरू किए गए वोकल फॉर लोकल अभियान है। पीएम-एफएमई मौजूदा माइक्रो खाद्य प्रसंस्करण उद्यमों के उन्नयन के लिए वित्तीय, तकनीकी और व्यावसायिक सहायता प्रदान करने का लक्ष्य रखता है जिसका सीधा लाभ आम लोगों को होता है।

ग्रामीण विकास मंत्रालय की एक विज्ञप्ति में कहा गया है कि मंत्रालयों की विभिन्न योजनाओं के बीच कन्वेंशन अहम एजेंडों में से एक है।

कंवर्जेस प्रक्रिया के तहत, एमओएफपीआई और दीनदयाल अंत्योदय योजना के जरिये ग्रामीण विकास मंत्रालय के राष्ट्रीय ग्रामीण आजीविका मिशन दोनों खाद्य प्रसंस्करण के क्षेत्र में स्व-सहायता समूह से जुड़े उद्यमियों का समर्थन करने के लिए एक साथ काम करने के लिए सहमत हुए।

इससे जुड़े दस्तावेजों में कहा गया है कि योजना के सभी घटकों में, दोनों मंत्रालयों ने स्व-सहायता समूह सदस्यों को बीज पूंजी सहायता प्रदान करने के घटक पर बारीकी से काम करने का फैसला किया है।

इसमें कार्यशील पूंजी और उनके मौजूदा व्यापार कारोबार और आवश्यकता के आधार पर 40,000 रुपये प्रति एसएचजी सदस्य के रूप में अधिकतम अनुमेय राशि के साथ छोटे उपकरणों की खरीद शामिल है।

राष्ट्रीय स्तर पर दोनों मंत्रालयों की संबंधित टीमों ने इस घटक के कार्यान्वयन को सुविधाजनक बनाने के लिए योजना – दिशानिर्देश, संयुक्त सलाह, प्रशिक्षण और जागरूकता अभियान – के लिए परिचालन ढांचे को औपचारिक बनाने में एक साथ काम किया।

राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों में राज्य ग्रामीण आजीविका मिशन और राज्य नोडल एजेंसियां आपसी समन्वय के साथ इस कार्यक्रम को अंजाम दे रही हैं। इसमें लक्षित पात्र लाभार्थियों की पहचान, उनकी आकांक्षाओं और विकास योजनाओं को लागू करना, अनुप्रयोगों के रूप में डिजिटलीकरण, समीक्षा करना, उनकी सिफारिश करना और अनुमोदन करना शामिल है।

दस्तावेज में कहा गया है कि 2020-21 के दौरान, कुल 17,427 लाभार्थियों की जांच की गई और 51.85 करोड़ रुपये के बीज पूंजी समर्थन के लिए सिफारिश की गई।

आंध्र, अरुणाचल प्रदेश, असम, छत्तीसगढ़, महाराष्ट्र, मिजोरम, ओडिशा और तेलंगाना अग्रणी रहे हैं और इन सिफारिशों में कुल लाभार्थियों का 83 प्रतिशत और फंड की कुल माँग का 80 प्रतिशत योगदान दिया है।

अब तक, आंध्र प्रदेश, छत्तीसगढ़, गोवा, गुजरात, हरियाणा, हिमाचल प्रदेश, कर्नाटक, मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र, मेघालय, ओडिशा, राजस्थान से 6,694 उद्यमों को कवर करने वाले 10,314 लाभार्थियों के लिए बीज पूंजी सहायता के लिए 29.01 करोड़ की राशि को मंजूरी दी गई है।

आईएएनएस

आरजेएस

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