शराब की लत वाला गांव बन गया जैविक खेती का मॉडल गांव

बहराइच, 9 अप्रैल (आईएएनएस)। उत्तर प्रदेश का एक ऐसा गांव जहां बेरोजगारी दर काफी ज्यादा होने के बाद भी वहां के लोग शराब का सेवन करने में बहुत आगे थे, अब वे एसआरआई (सिस्टम ऑफ राइस इंटेंसिफिकेशन) और जैविक खेती के लिए मॉडल बन गए हैं। साथ ही उत्तर प्रदेश के जिला बहराइच का यह छोटा सा गांव कैलाशनगर अब खासियत के चलते खासा नाम कमा रहा है।

कैलाशनगर अब पूरी तरह से शराब मुक्त है और एसआरआई में नए रिकॉर्ड बना रहा है। यहां के लोग कम पानी में खेती करने की पद्धति का उपयोग करके चावल की खेती कर रहे हैं और जैविक खेती कर रहे हैं। उनकी खेती के तरीके इतने सफल रहे हैं कि देश के विभिन्न हिस्सों और यहां तक कि संयुक्त राष्ट्र विकास कार्यक्रम से जुड़े लोग भी किसानों की इन तकनीकों को समझ रहे हैं। हाल ही में, सार्वजनिक स्वास्थ्य का अध्ययन करने वाले अमेरिकी छात्रों ने इन किसानों के कृषि मॉडल को समझने के लिए कैलाशनगर का दौरा किया था। इस गांव के 2 किसानों को खेती में श्रेष्ठता के लिए राज्य सरकार से पुरस्कार भी मिल चुका है।

कैलाशनगर के ग्रामीणों ने एक लंबा सफर तय किया है। दशकों से, इस छोटे से गांव के रहने वाले लोग शराब पीने के लिए जाने जाते थे। बहुत कम लोगों के पास नौकरियां थी और उनमें से ज्यादातर पेड़ों को काटकर और उसकी लकड़ी बेचकर अपना खर्च चलाते थे।

लगभग एक दशक पहले कमजोर लोगों के साथ काम करने वाली एनजीओ डेवलपमेंट एसोसिएशन फॉर ह्यूमन एडवांसमेंट के सदस्यों ने कैलाशनगर के पास बिछिया बाजार में एक शराब की दुकान पर भारी भीड़ देखी थी। इसके बाद उन्होंने सूचना के अधिकार के तहत यह पता लगाया कि इस इलाके में कितनी शराब पी जाती है, लेकिन जानकारी मिलने के बाद वे चौंक गए कि हर साल 5 गांवों के लोग 22 लाख रुपये के करीब शराब पर खर्च करते हैं।

डीईएचएटी के मुख्य कार्यकारी अधिकारी जितेंद्र चतुर्वेदी ने ग्रामीणों को शराब पर खर्च होने वाली राशि की जानकारी दी और बताया, सिंचाई, शिक्षा, दवाओं और शादियों के लिए जो पैसा इस्तेमाल किया जाना चाहिए, वह शराब पीने पर खर्च किया जा रहा है। इन आंकड़ों ने ग्रामीणों को सोचने पर मजबूर किया और उन्होंने फिर कभी शराब नू छूने की कसम खाई। शराब छोड़ने वाला पहला व्यक्ति गीता प्रसाद था। बाद में उससे प्रेरित होकर गांव के अन्य ग्रामीणों ने भी शराब पीना छोड़ दी।

शराब की खपत बंद हो गई, तो गांवों में लोग आजीविका के बेहतर साधन तलाशने लगे। लेकिन विकल्प सीमित थे क्योंकि कैलाशनगर वन भूमि में था और इस जगह कई प्रतिबंध थे। ग्रामीणों ने नौकरियों के लिए नरेगा की को देखा। लेकिन उन्होंने सोचा कि वे खेती के लिए अपनी जमीन का उपयोग क्यों नहीं कर सकते। डीईएचएटी के सदस्यों ने स्थानीय लोगों को कृषि की मूल बातें समझने में मदद की। डीईएचएटी ने कई संस्थानों के किसानों के लिए नए तरीकों से प्रशिक्षण का आयोजन किया। उन्होंने रसायनों के उपयोग के बिना उपज में सुधार करना भी सीखा। अगले कुछ वर्षों में, उन्होंने कई तरह की फसलें उगाईं और कभी गरीबी से जूझने वाला गांव समृद्ध होने लगा। वे अब ग्रामीणों की खाद्य जरूरतों को पूरा करने में सक्षम थे और मुनाफा भी कमाने लगे थे।

गांव के किसान प्रसाद बताते हैं, मेरा एकमात्र काम पूरे दिन पीना और शाम को परिवार को परेशान करना था। खेती से हमारा जीवन बदल गया है। पूरे गांव की आय कई गुना बढ़ गई है। अब हमारे गांव का एक बच्चा उच्च शिक्षा के लिए लखनऊ में है, दो लड़कियां और तीन लड़के किसान डिग्री कॉलेज, बहराइच में पढ़ रहे हैं और पांच लड़कियां और नौ लड़के बप्पा जी इंटर कॉलेज, चफरिया में पढ़ रहे हैं।

कैलाशनगर के बाबू राम का कहना है, उनके गांव में उगाई जाने वाली सब्जियां स्थानीय बाजार में सबसे तेजी से बिकती हैं, भले ही उनकी कीमत दूसरी सब्जियों की तुलना में 25 प्रतिशत अधिक हो। ऐसा इसलिए है क्योंकि हम अपनी फसलों में किसी भी कीटनाशक या अंग्रेजी खाद का उपयोग नहीं करते हैं। हम गोमूत्र और कीटनाशक के साथ लहसुन, तम्बाकू और दही के साथ अपना खाद बनाते हैं। इसी के चलते हमारी फसलें स्वस्थ और स्वादिष्ट होती हैं।

ग्रामीणों ने शराब और गरीबी के खिलाफ एक लड़ाई जीती है, लेकिन वे कैलाशनगर को एक राजस्व गांव का दर्जा देने के लिए अपनी दशकों पुरानी लड़ाई जीतने के लिए अभी भी प्रयास कर रहे हैं। कतर्नियाघाट वन्यजीव प्रभाग के पास स्थित, कैलाशनगर एक राजस्व गांव नहीं है, बल्कि वनटांगिया (एक समुदाय जो पहले वनीकरण के लिए अंग्रेजों द्वारा काम पर रखा गया था) की श्रेणी में आता है। इसलिए, यहां किसी भी पक्के निर्माण की अनुमति नहीं है।

यदि आप इस छोटे से गांव में जाएं, तो आपको न तो पक्के घर दिखेंगे और न ही पक्के शौचालय। इस गांव में स्कूल, पानी की टंकी, पंचायत भवन या अस्पताल नहीं है। एक राजस्व गांव की स्थिति के बिना, गांव के सदस्यों के पास जमीन पर पूर्ण अधिकार नहीं है, जिससे उन्हें सरकारी योजनाओं और बैंक ऋण का लाभ नहीं मिल पाता है। कई बाधाओं के बावजूद, ग्रामीण खुश हैं कि वे कैलाशनगर को सफल खेती के मॉडल के रूप में मानचित्र पर लाने में कामयाब रहे और वे जल्द ही अपनी राजस्व स्थिति के लिए आशान्वित हैं।

–आईएएनएस

एचके/एसडीजे

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