राष्ट्र निर्माण कार्य में सरकार की मदद करें : आनंदजी शाह

मुंबई, 15 अगस्त (आईएएनएस)। प्रसिद्ध राष्ट्रीय पुरस्कार विजेता कल्याणजी-आनंदजी की जोड़ी में से आनंदजी वी. शाह ने कहा कि देश ने पिछले 75 वर्षो में खासकर के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के शासन के दौरान जबरदस्त प्रगति की है, लेकिन अब सभी लोगों को एकजुट होने और बड़े पैमाने पर राष्ट्र-निर्माण कार्य में सरकार की मदद करने का समय है।

उन्होंने याद किया कि कैसे, कई दशक पहले, राष्ट्रपिता महात्मा गांधी ने एकता के लिए एक जादू का मंत्र दिया था, जिसे सभी लोगों ने ब्रिटिश शासन के खिलाफ लड़ने के लिए स्वीकार किया और उसका पालन किया।

88 वर्षीय आनंदजी ने कहा, गांधीजी का वह मंत्र आज भी उतना ही प्रासंगिक है। कुछ ऐसा ही करने की जरूरत है। इस समय भी हमें राष्ट्रनिर्माण के लिए उसी तरह की एकता प्रदर्शित करने की जरूरत है।

यह स्वीकार करते हुए कि युवा देश के उज्‍जवल भविष्य हैं, उन्होंने कहा कि आधुनिक युवा विशेष रूप से अपने अधिकारों, कर्तव्यों और जिम्मेदारियों के बारे में बहुत जानकार हैं, और उनकी शिक्षा का स्तर बहुत ऊंचा है।

कल्याणजी ने कहा कि मैं 75 साल पहले पैदा हुए लोग अब बहुत वरिष्ठ नागरिक हैं, उनके साथ समाज में और आधिकारिक तौर पर सम्मान के साथ व्यवहार किया जाना चाहिए।

आनंदजी ने आग्रह किया कि युवा पुरुष और महिलाएं कल के राष्ट्र-निर्माता हैं। इसलिए, यह हमारा कर्तव्य है कि हम उनके प्रयासों में उनका समर्थन करें, साथ ही, सभी को सचेत रूप से भारत को आगे ले जाने की विशाल चुनौती में सरकार की मदद करनी चाहिए।

उन्होंने आगाह किया कि इसे प्राप्त करने के लिए, नीतियों को बार-बार परिवर्तन के बजाय स्थिर और दीर्घकालिक रहना चाहिए, क्योंकि यह व्यवसाय के सुचारू रूप से फलने-फूलने में बाधा उत्पन्न कर सकता है।

कल्याणजी का मानना है कि सांसद को वह सम्मान मिलना चाहिए, जिसका वह हकदार हैं, जिन्हें हम अपने लोकतांत्रिक अधिकारों का प्रतिनिधित्व करने के लिए (सांसद) चुनते हैं।

एक गुजराती किराना व्यापारी के बेटे, जो मुंबई में बस गए, कल्याणजी-आनंदजी ने 250 से अधिक बॉलीवुड फिल्मों के लिए संगीत बनाया और 1968 की ब्लॉकबस्टर, सरस्वतीचंद्र में अपने यादगार नंबरों के लिए राष्ट्रीय पुरस्कार जीता था।

उनके द्वारा रचित सैकड़ों गीतों में से कई ने लोकप्रियता हासिल कीं। जैसे गोविंदा आला रे (ब्लफमास्टर, 1963), उदास यहां मैं अजनबी हूं (जब जब फूल खिले, 1965), देशभक्ति मेरे देश की धरती (उपकार, 1967), पारंपरिक मैं तो भूल चली बाबुल का देश (सरस्वतीचंद्र, 1968), गंगा मैया में जब तक (सुहाग रात, 1968), जीवन से भारी तेरी आंखे ( सफर, 1970), क्या खूब लगती हो (धर्मात्मा, 1975),खाइके पान बनारसवाला (डॉन, 1978), लैला ओ लैला (कुबार्नी, 1980) और मेरे अंगने में, तुम्हारा क्या काम है (लावारिस, 1981)आदि।

–आईएएनएस

एमएसबी/आरएचए

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