तृणमूल कांग्रेस मुस्लिम वोटों को एकजुट करने में सफल रही

कोलकाता, 3 मई (आईएएनएस)। पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनावों में शानदार जीत हासिल करने वाली तृणमूल कांग्रेस मुस्लिम वोटों को मजबूत करने में सफल रही और इसका चुनाव के नतीजों पर सीधा असर पड़ा।

63 मुस्लिम बहुल विधानसभा क्षेत्रों में से 61 निर्वाचन क्षेत्रों में हुए थे और तृणमूल कांग्रेस ने उनमें से 58 में, भाजपा ने दो में और एक में संजुक्त मोर्चा ने जीत हासिल की।

मुस्लिम बहुल सीटों के अधिकांश हिस्से चार जिलों – मुर्शिदाबाद, मालदा, उत्तर 24 परगना और दक्षिण 24 परगना में हैं। जबकि मुर्शिदाबाद में कुल 22 विधानसभा सीटों में 16 मुस्लिम बहुल सीटें हैं, बाकी तीन जिलों में 9 विधानसभा सीटें हैं। हालांकि, इन कुल 63 सीटों में से 61 में चुनाव हुए थे, क्योंकि दो जिलों – समसरगंज और जंगीपुर में उम्मीदवारों की मृत्यु के कारण चुनाव स्थगित कर दिए गए थे। बाकी 61 सीटों में से तृणमूल कांग्रेस 58 सीटें हासिल करने में सफल रही।

दिलचस्प बात यह है कि इन 58 सीटों में से तृणमूल कांग्रेस 40,000 या उससे अधिक मतों के अंतर से 30 सीटें जीतने में सफल रही। मालदा जिले के सुजापुर में एस.के. जियाउद्दीन, फरक्का में मोनिरुल इस्लाम, भगांगोला में इदरीस अली – मुर्शिदाबाद में दोनों उम्मीदवार कुल मतों के 50 प्रतिशत से ऊपर वोट पाकर 50,000 से अधिक वोटों के अंतर से जीतने में कामयाब रहे। भाजपा को उत्तरी दिनाजपुर में केवल एक सीट और मुर्शिदाबाद जिले में दूसरी सीट मिली, जबकि भारतीय सेक्युलर मोर्चा (संजुक्ता मोर्चा का सहयोगी) दक्षिण 24 परगना जिले के भांगर में एक सीट पर कामयाब रहा।

भाजपा के पक्ष में हिंदू वोटों के ध्रुवीकरण की संभावना देखकर मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने आशंका जताई थी कि अगर मुस्लिम वोट तृणमूल के खाते में नहीं आते हैं तो यह उनकी हार का कारण बन सकता है। यह उनके भाषणों में स्पष्ट था, जहां उन्होंने चुनावी सभा में कहा था कि जो व्यक्ति हैदराबाद से बंगाल का दौरा कर रहा है, उसे विधानसभा चुनाव लड़ने के लिए भाजपा से पैसा मिला है। उन्होंने ऑल इंडिया मजलिस-ए-इत्तेहाद-उल-मुस्लिमीन (एआईएमआईएम) के प्रमुख असदुद्दीन ओवैसी पर निशाना साधा था।

ममता फुरफुरा शरीफ के मौलवी अब्बास सिद्दीकी पर भी बरसी थीं, जिन्होंने भारतीय धर्मनिरपेक्ष मोर्चा (आईएसएफ) का गठन किया और चुनाव लड़ने के लिए कांग्रेस और वाम मोर्चे से हाथ मिलाया।

मुस्लिम वोट बैंक बंगाल चुनाव में एक बड़ा और निर्णायक कारक है। लगभग साढ़े तीन दशकों तक, मुसलमानों को वाम मोर्चा का वोट बैंक माना गया, जिसने राज्य में 34 वर्षों तक शासन किया। बदलाव तब आया, जब सिंगूर और नंदीग्राम आंदोलन के दौरान टीएमसी ने किसानों, मजदूरों और मुसलमानों और खासकर गरीबों को एकजुट किया और मुसलमानों ने वामपंथियों से मुंह मोड़कर तृणमूल कांग्रेस में अपनी निष्ठा जताई।

साल 2011 में वाम मोर्चा मुस्लिम वोट बैंक को अपने साथ बनाए रखने में सफल रहा और 45 प्रतिशत अल्पसंख्यक वोटों का प्रबंधन किया, लेकिन तत्कालीन सरकार के खिलाफ भारी आक्रोश ने ममता बनर्जी को सत्ता दिला दी।

विश्लेषकों ने कहा, परिणाम साबित करते हैं कि ममता मुस्लिम वोटों को अपने पक्ष में करने में सफल रहीं। तृणमूल कांग्रेस को आईएसएफ का डर था, मुस्लिम धर्मगुरु के नेतृत्व में नवोदित राजनीतिक दल तृणमूल कांग्रेस का खेला बिगाड़ सकता था। मगर वे मुस्लिम वोटों को बांटने में कामयाब नहीं हो पाए, इसलिए सत्तारूढ़ तृणमूल कांग्रेस का ज्यादा नुकसान नहीं हो पाया।

–आईएएनएस

एसजीके/एएनएम

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