जब नेहरू ने पुलिस को नटवर का पता लगाने कहा (आईएएनएस साक्षात्कार-2)

 नई दिल्ली, 19 मई (आईएएनएस)| कुंवर नटवर सिंह कई अर्थो में एक विशिष्ट व्यक्ति हैं जिन्होंने कांग्रेस की कई सरकारों में विभिन्न पदों पर अपनी सेवाएं प्रदान की हैं।

  साथ ही, वह भारत ही नहीं दुनिया के भी चर्चित नेताओं, ख्याति प्राप्त लेखकों और महत्वपूर्ण पदों पर रहे शख्यिसतों के काफी करीबी रहे। कैंब्रिज में बिताए दिनों के दौरान वह उपन्यासकार ई.एम. फोर्स्टर से प्रभावित हुए जिनसे उन्होंने मैत्री का मूल्य जाना।

 

उनके आईएएनएस के साथ साक्षात्कार की श्रखंला के दूसरे व आखिरी भाग में तीन प्रमुख शख्सियतों के साथ काम करने के उनके अनुभव पर एक नजर :

इंदिरा गांधी :

नटवर सिंह ने कहा, “मैंने 1966 से लेकर 1971 तक पांच साल श्रीमती गांधी के दफ्तर में काम किया जोकि काफी छोटा था और उनका सर्किल काफी संकुचित था।”

उन्होंने कहा, “सात अधिकारी थे जिनमें पी. एन. हस्कर, एस. बनर्जी, एच. वाई. शारदा प्रसाद, रामचंद्रन, मोनू मल्होत्रा और मैं थे। शास्त्रीजी के असमय निधन के बाद काफी हिचकिचाहट के साथ वह प्रधानमंत्री बनीं। लेकिन, उन्होंने इस काम को सहजता से लिया और दो साल के भीतर उन्होंने सिंडिकेट को समाप्त कर दिया। किस्मत की बात थी कि उनके पास पी. एन. हस्कर जैसे बौद्धिक शख्सियत थे जिन्होंने उनके प्रधान सलाहकार के तौर पर हर कदम पर उनको परामर्श दिया।”

सिंह ने कहा, “मैं विदेश सेवा का अधिकारी था। हर विदेश दौरे पर मैं उनके साथ जाता था, इससे मेरे व्यक्तित्व पर असर पड़ा और मुझे कम ही उम्र में काफी पहचान मिल गई। वैश्विक मामलों में मेरा नजरिया बदल गया क्योंकि मुझे व्यक्तिगत तौर पर दुनिया के नेताओं के साथ काम करना होता था।”

उन्होंने कहा, “उन्हें समय का काफी बोध था। उन्होंने मार्च 1971 में हस्कर से कहा कि हमें ढाका में दमनकारी सत्ता का खात्मा करने के लिए कदम उठाना चाहिए। हस्कर ने (फील्ड मार्शल सैम) मानेकशॉ को बुलाया जिन्होंने यह कहते हुए इसकी सलाह देने से मना कर दिया कि भारत इसके लिए तैयार नहीं है जबकि भारत में शरणार्थियों की संख्या बढ़ती जा रही थी।”

मानेकशॉ ने कहा कि हमें मानसून सीजन के बीतने का इंतजार करना चाहिए क्योंकि इस दौरान सैन्य अभियान पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ सकता है। जैसे ही भारत की तैयारी पूरी हुई और मानसून का सीजन बीता, भारत कूच कर गया।

नटवर सिंह ने कहा कि हस्कर अव्वल दर्जे के बुद्धिमान थे, जिन्होंने इंदिरा को सिंडिकेट को समाप्त करने और बांग्लादेश सैन्य अभियान का संचालन करने में मदद की।

सिंह ने बताया, “असल में भारत में पहली बार कैबिनेट सचिव की तुलना में प्रधानमंत्री के प्रधान सचिव ज्यादा अहम बन गए गए थे। मैंने ब्रजेश मिश्रा के सिवा और किसी को प्रधानमंत्री से इतना करीब नहीं देखा।”

सिंह ने कहा कि इलाहाबाद के वकील हस्कर काफी बुद्धिमान थे और सर तेज बहादुर सप्रू ने उनकी सिफारिश नेहरू के पास की थी। इंदिरा गांधी के उत्कर्ष और भारत की शासन-व्यवस्था को उन्नत बनाने में हस्कर की केंद्रीय भूमिका रही।

सिंह ने कहा, “श्रीमती गांधी के लिए वह परीक्षा की घड़ी थी जब उनको कांग्रेस के कद्दावर नेता कामथ, अतुल्य घोष, एस.के. पाटील, निजलिंगप्पा के सिंडिकेट के साथ जूझना पड़ा था। इसके बाद 1970 तक वह कांग्रेस की अविवादित मुखिया बन गईं। सत्ता का यह खेल मैंने अपने सामने होता देखा है। वह चुनौतियों से कभी पीछे हटने वाली नहीं थीं।”

उन्होंने कहा, “मुझे याद है जब वह संयुक्त राष्ट्र की सालगिरह पर आई थीं। एल. के. झा उस समय राजदूत थे और वीप रिचर्ड निक्सन ने उनको बिना किसी लिखित निमंत्रण पत्र के रात्रिभोज पर आमंत्रित किया था। उन्होंने लिखित निमंत्रण के बिना जाने से मना कर दिया और जब यह नहीं आया तो उन्होंने मुझे एक खेदजनक पत्र लिखने को कहा। जब मैंने इसे झा को दिया तो उन्होंने कहा कि यह तो बड़ा रुखा है। मैंने कहा कि उनका यही तरीका है। बेशक वह नहीं गईं।”

विजयलक्ष्मी पंडित :

नटवर सिंह ने कहा, “श्रीमती गांधी से पहले मेरा एकमात्र दुर्भाग्य था कि मुझे सुश्री पंडित के साथ 1961 से लेकर 1966 तक संयुक्त राष्ट्र परमानेंट मिशन के तहत न्यूयार्क में काम करना पड़ा। मेरे लिए यह आंखें खोलने वाली बात थी क्योंकि संसद का केंद्रीय कक्ष आपको भारत का जो नजरिया पेश करता है वहीं नजरिया दुनिया के संबंध में यूएन लाउंज पेश करता है। संयुक्त राष्ट्र महासभा की सितंबर और दिसंबर की बैठक महत्वपूर्ण थी क्योंकि उपनिवेशवाद की समाप्ति को लेकर विप्लवादी बदलाव हो रहे थे। इन सारे देशों की यात्रा करना और विश्व के नेताओं से बातचीत करना एक आकर्षक दौर था।”

उन्होंने बताया, जॉन एफ. केनेडी अमेरिका के राष्ट्रपति थे। कृष्ण मेनन की जगह विजयलक्ष्मी आई थीं और वह मुझे लेकर गई थीं। केनेडी की हत्या हो गई और विजयलक्ष्मी ने अरलिंगटन में उनकी अंत्येष्टि में भारत का प्रतिनिधित्व किया। उसके बाद जैकी केनेडी ने श्रद्धांजलि देने के लिए एकत्रित हुए दुनिया के सारे विशिष्टजनों का स्वागत किया।

सिंह ने कहा, मैं उनके पास ही था और मुझे याद है कि चार्ल्स डि गॉल ने उनसे पूछा कि आपके भाई कैसे हैं। इस पर उन्होंने जवाब देते हुए कहा कि उनकी अपनी समस्याएं हैं। उनका हाजिर जवाब था, “उनको बताइए कि मेरी भी (समस्याएं) हैं।”

जवाहरलाल नेहरू :

नटवर सिंह ने कहा, “मैं 1960-61 के दौरान विदेश मंत्रालय के महासचिव आर.के. नेहरू का निजी सचिव था और हमारा दफ्तर प्रधानमंत्री कार्यालय से 20 गज की दूरी पर था। पंडितजी हमारे कमरे से आते-जाते रहते थे। उन दिनों यह अनौपचारिक बात थी। प्रधानमंत्री के पास से सारे कागजात महासचिव के पास जाते थे और उसके बाद उन्हें भेजना मेरा काम था।”

सिंह ने कहा, “मुझे याद है कि जब शाम में देर से एक फाइल नेपाल की आई थी जिसमें प्रधानमंत्री ने नेपाल के राजा को चार पृष्ठों का एक पत्र लिखा था और उनको रसभरी दिया था। अगली सुबह आर.के. नेहरू चीन के लिए प्रस्थान करने वाले थे। संयोग से पत्र की बात भूलकर मैं आर.के. के साथ हवाई अड्डा चला गया जहां उनकी उड़ान में विलंब था। ”

सिंह ने कहा, “इस बीच पंडितजी सुबह ठीक 9.30 बजे अपने दफ्तर पहुंचे और उन्होंने पूछा कि क्या पत्र भेजा जा चुका है। उनको दफ्तर में बताया गया कि आर.के. नेहरू और नटवर दोनों गायब हैं। विदेश सचिव एम. जी. देसाई से जब उन्होंने पूछा कि क्या उन्होंने पत्र देखा है तो उन्होंने कहा, ‘नहीं’, जिसके बाद पर प्रधानमंत्री बरस पड़े।”

उन्होंने बताया, “पंडितजी ने कहा कि फाइल कहां है। अब मैं भी नहीं था, इसलिए पंडितजी ने अपने दफ्तर को पुलिस को अलर्ट करते हुए मेरी तलाश करने को कहा। इसके बाद वह हमारी आलमारी तुड़वाना चाहते थे। लेकिन इतने में किसी ने मुझे हवाई अड्डे पर इसकी सूचना की। मैं वापस दफ्तर की ओर भागा और पंडितजी से नजर बचाते हुए फाइल देसाई को दिया। पंडितजी तब तक नाराज रहे जब तक उनको यह नहीं बताया गया कि मसले का समाधान हो गया है।”

सिंह ने कहा, सात दिनों तक मैं पंडितजी के गुस्से के डर के कारण उनसे नजर बचाते रहा लेकिन आठवें दिन अचानक उनके सामने पड़ गया और पंडितजी ने ऐसा व्यवहार किया मानो कुछ हुआ ही नहीं था। उन्होंने ‘सोल ऑफ चाइना’ नामक के किताब के बारे में चर्चा की।

नटवर सिंह ने बताया कि जब आइजनहावर भारत के दौरे पर आए थे तो मुझे संपर्क अधिकारी बनाया गया था और मैं लगातार पंडितजी के संपर्क में रहा। किसी को शायद ही कभी ऐसा अवसर मिलता है। उनके जैसा व्यक्ति अब नहीं मिलता है। वह एक साथ साहित्यकार और राजनेता थे।

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